Thursday, June 4, 2015

Hindi Tujhe

हिन्दी तुझे

क्या सोचती है
मैं अकेला निहत्था
इस संसार से लड़कर
तुझे डुबते हुए
अथाह सागर से
हाथ पकड़ बचा लूंगा
कहां है मुझमें वो दम
और कहां में साधूं
वो कपाल भाति
रोक सकूं सांसे जिससे
समुद्र के लवणीय पानी में
फिर तु भी  कहां
तैर रही है।
इस गहरे सागर की
लम्बी चैड़ी गोद  में
चैन की नींद
सो रही है।
इतनी गहराई तक
मैं स्वयं पहंुच जाऊं
ये मेरा औचित्य नही है।
माना किसी तरह से मैं
जो तेरे पास
पहंुच भी जाऊं
फिर उल्ट पैर मैं
आ ना पाऊं
सांसे हो जायेंगी
समुद्र का उपहार मेरी
विलीन हो जाऊंगा
समुद्र में मैं
मिट जायेगी मेरी हस्ती
रहेगी पिछे सिर्फ मेरी
चंद बचपन की यादें
ओर गूंजती किलकारियां।
      -ः0ः-

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