Tuesday, September 20, 2016

सूना पथ



सूना पथ


सुनसान अविचल    
धूप में नहाता हुआ,
अकेला चिल्ला-चिल्लाकर    
पथिक तुझे पुकार रहा।

                       कंकड़ धूप से हुए हैं लाल
                       पगों को कर देंगे बेहाल
                       फिर भी बढ़ना तो पड़ेगा
                       क्या गर्मी, क्या वर्षाकाल

ऋतुओं का ये हेर-फेर
तन को जैसे दुत्कार रहा
अकेला चिल्ला-चिल्लाकर
पथिक तुझे पुकार रहा।

                     आंख मिचौली करने को
                     जो इन पर है बढ रहा
                     अकेला चिल्ला-चिल्लाकर
                     पथिक तुझे पुकार रहा।

          -ः0ः-

धरती



   धरती

मैंने उसको                                      
जब भी देखा,
खिलते देखा
उजड़ते देखा
बहकते देखा
महकते देखा
हंसते देखा
रोते देखा
स्वर्ण सुरभि
छेड़ते देखा
पर इसको
जब.........
कुपित देखा
शक्ति रूप
बदलते देखा
समाहित कर
भूमंडल को
उदर में अपने
धरते देखा ।
   -ः0ः-

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हिन्दी साहित्य



 हिन्दी साहित्य     

साहित्य के अथाह सागर में  
डुबकी लगाना चाहता हूं,               
डुबे हुए बहुमूल्य शब्द चुन
हिन्दी को बचाना चाहता हूं ।
आज जरूरत है मेहनत की
जो बना दे लोहे को सोना
भोतरे शब्द तपा-तपा कर
बना दे जो बहुमूल्य हीरा
फिर लेकर मैं हथौड़ा
अक्षरों को पीटना चाहता हूं,
डुबे हुए बहुमूल्य शब्द चुन
हिन्दी को बचाना चाहता हूं ।
तपाकर कूट-कूट षब्दों को   
दूंगा फिर से आकार मैं
सुन्दर रेशमी धागे में पिरोकर
बना दूंगा गले का हार मैं
फिर हिन्दी साहित्य में मैं
वो चमक लाना चाहता हूं,
डुबे हुए बहुमूल्य शब्द चुन   
हिन्दी को बचाना चाहता हूं ।
इन शब्दों का हार बनाकर
दुनिया के गले सजाऊंगा
नित देंखूं नित उजला होए
ऐसा मैं हार बनाऊंगा
दुनिया पहने मेरे हार को
बस यही मैं चाहता हूं,
डुबे हुए बहुमूल्य शब्द चुन
हिन्दी को बचाना चाहता हूं ।

         -ः0ः-

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